नैनीताल हाईकोर्ट की रोक के बावजूद आसन कंजर्वेशन रिजर्व के आसपास कैसे चल रहे स्टोन क्रशर?
देहरादून/नैनीताल: आसन कंजर्वेशन रिजर्व (Asan Conservation Reserve), जो उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि (wetland) और रामसर स्थल है, वन्यजीव संरक्षण के लिए जाना जाता है। यहां प्रवासी पक्षी, दुर्लभ प्रजातियां और जैव विविधता का खजाना है। लेकिन 2014 से लागू नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद, जिसमें नेशनल पार्क, सैंक्चुअरी और संरक्षित क्षेत्रों की 10 किलोमीटर परिधि में खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था, आसन रिजर्व के आसपास कई स्टोन क्रशर संचालित हो रहे हैं। अब जनहित याचिका (PIL) संख्या 2023/2025 (या संबंधित WPPIL/223/2025) में 9 जनवरी 2026 को पारित हाईकोर्ट के आदेश ने इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
हाईकोर्ट के हालिया आदेश की मुख्य बातें
हाईकोर्ट ने 9 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान प्रमुख सचिव (वन/खनन), जिलाधिकारी देहरादून और अन्य संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे कोर्ट को बताएं:
आसन कंजर्वेशन रिजर्व की परिधि में संचालित सभी स्टोन क्रशरों की सटीक दूरी कितनी है।
प्रतिबंधित क्षेत्र (10 किमी परिधि) में चल रहे लगभग 24 स्टोन क्रशरों को नोटिस जारी कर उनका जवाब तलब किया गया है।
कोर्ट ने सवाल उठाया है कि जब 2014 से ही 10 किमी परिधि में खनन और संबंधित गतिविधियों पर रोक है, तो इन स्टोन क्रशरों को अनुमति कैसे मिली? नियमों के मुताबिक, ऐसे क्षेत्रों में स्टोन क्रशर चलाने के लिए नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) की अनुमति और पर्यावरण मंत्रालय से पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) अनिवार्य है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 2(24-क) के तहत आसन रिजर्व संरक्षित क्षेत्र है, जहां ऐसी गतिविधियां सख्ती से प्रतिबंधित हैं।
याचिकाकर्ता का दावा
जनहित याचिका दायर करने वाले और ईको डेवलपमेंट कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद आरिफ ने कहा है, “जब आम नागरिक संरक्षित क्षेत्र में कोई छोटी-मोटी गतिविधि भी नहीं कर सकता, तो स्टोन क्रशरों को संचालन की अनुमति किस आधार पर दी गई? इन क्रशरों से धूल, शोर और प्रदूषण के कारण जैव विविधता, वन्यजीवों (खासकर प्रवासी पक्षियों) और आसन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।”
क्यों जारी है संचालन?
कई मामलों में पुरानी अनुमतियां या प्रशासनिक अनदेखी का आरोप लगता है।
उत्तराखंड में स्टोन क्रशरों से जुड़े कई अन्य मामले हाईकोर्ट में चल रहे हैं, जैसे हरिद्वार में गंगा किनारे क्रशर बंद करने के आदेश (जुलाई 2025) और अन्य इलाकों में नए लाइसेंस पर रोक।
आसन वेटलैंड के बफर जोन में खनन/क्रशरों पर हिमाचल हाईकोर्ट तक में चर्चा हुई है, लेकिन उत्तराखंड में क्रियान्वयन कमजोर दिखता है।
विभागों की रिपोर्ट और NBWL की मंजूरी के बिना जारी संचालन नियमों की उल्लंघना है, लेकिन कार्रवाई में देरी से सवाल खड़े होते हैं।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें विभागीय अधिकारियों के हाईकोर्ट में दिए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं। क्या 10 किमी नियम का पालन सुनिश्चित होगा? क्या इन 24 क्रशरों पर कार्रवाई होगी या अनदेखी जारी रहेगी? यह मामला उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण vs औद्योगिक गतिविधियों के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण बन गया है।
यदि नियमों का सख्ती से पालन हुआ तो आसन कंजर्वेशन रिजर्व की जैव विविधता सुरक्षित रह सकती है, अन्यथा प्रवासी पक्षियों और स्थानीय पारिस्थितिकी को स्थायी नुकसान हो सकता है।


