देहरादून: उत्तराखंड में खनन गतिविधियों को लेकर विभागीय अधिकार क्षेत्र और दिलचस्पियों का नया विवाद सामने आया है। विकासनगर के ढकरानी क्षेत्र में वन विभाग के एक एसडीओ स्तर के अधिकारी द्वारा खनन स्टॉक की जांच करने का प्रयास खनन व्यवसायियों के विरोध में बदल गया। व्यवसायियों ने सवाल उठाया कि वन विभाग को यह अधिकार किस आधार पर प्राप्त है?
घटना का विवरण
जानकारी के अनुसार, वन विभाग के उक्त अधिकारी ढकरानी पहुंचे और खनन स्टॉक की पड़ताल शुरू करने लगे। खनन व्यवसायियों ने तत्काल विरोध जताते हुए कहा कि खनन स्टॉक की जांच का अधिकार केवल खनन विभाग और राजस्व विभाग को है। वन विभाग की इस दखलंदाजी को उन्होंने अनधिकारिक करार दिया।
व्यवसायियों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी लंबे समय से खनन गतिविधियों में अत्यधिक रुचि दिखा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, अधिकारी ने अन्य विभागों से टीम मांगी थी, लेकिन किसी ने सहयोग नहीं किया। अंततः वे अकेले ही मौके पर पहुंचे और कार्रवाई शुरू करने का प्रयास किया, जिसका उन्हें स्थानीय व्यवसायियों से विरोध का सामना करना पड़ा।
पूर्व में भी विवाद में रहे अधिकारी
यह पहली बार नहीं है जब इस अधिकारी का नाम खनन से जुड़े विवाद में आया हो। इससे पहले उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें वे खनन साइट पर पहुंचकर कांटों (तौल उपकरण) की जांच करते दिख रहे थे। उस समय भी सवाल उठे थे कि वन विभाग का अधिकारी खनन विभाग की जिम्मेदारी क्यों निभा रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि घटनास्थल कालसी वन प्रभाग के अंतर्गत आता है, जबकि संबंधित अधिकारी चकराता वन प्रभाग में तैनात हैं। अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर दिखाई गई इस सक्रियता ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
खनन व्यवसायियों का पक्ष
खनन व्यवसायियों का कहना है कि यदि कोई अनियमितता है तो संबंधित विभाग (खनन एवं राजस्व) जांच कर सकते हैं। दूसरे विभागों के अधिकारियों द्वारा बार-बार इस तरह की “अतिरिक्त सक्रियता” से संदेह पैदा होता है। उन्होंने पूछा है कि क्या यह शुद्ध विभागीय जिम्मेदारी है या इसके पीछे कोई अन्य वजह छिपी हुई है?
प्रशासनिक स्थिति
वन विभाग के इस कदम को लेकर अब स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। उत्तराखंड में खनन माफिया और विभागीय हस्तक्षेप के पुराने आरोपों के बीच यह घटना नए सिरे से बहस छेड़ने वाली मानी जा रही है।
फिलहाल वन विभाग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। खनन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों से भी इस संबंध में प्रतिक्रिया लेने का प्रयास जारी है।
डकरानी की यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि उत्तराखंड में खनन केवल खनिजों और राजस्व का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि विभागीय अधिकार क्षेत्र और संभावित दिलचस्पियों का गहरा केंद्र भी बनता जा रहा है।


