पछवादुन के जंगलों में गिरे हुए पेड़ों को हरबर्टपुर निगम डिपो तक पहुंचाने में बड़ा घोटाला का आरोप सामने आ रहा है। विभाग पर सवालिया निशान लग रहे हैं।
ताजा मामला: रुद्रपुर के जंगलों की नीलामी
पछवादुन क्षेत्र के रुद्रपुर के जंगलों में गिरे हुए पेड़ों की नीलामी हाल ही में हुई थी। ठेकेदार को जंगलों से इन पेड़ों को काटकर हरबर्टपुर स्थित वन निगम डिपो तक पहुंचाने का ठेका मिला था। लेकिन सूत्रों का कहना है कि जंगलों से काटी गई लकड़ी डिपो तक नहीं पहुंच रही है।
आरोप है कि ठेकेदार और वन विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से बंदरबांट हो रही है। लकड़ी बीच रास्ते में ही गायब हो जा रही है या अवैध तरीके से बेची जा रही है, जिससे प्रदेश की कीमती वन संपदा का दोहन हो रहा है और सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
विभाग पर उठ रहे सवाल
नीलामी के बाद लकड़ी की ट्रांसपोर्टेशन और पहुंच की निगरानी कौन कर रहा है?
क्या डिपो में पहुंचने वाली लकड़ी की मात्रा और गुणवत्ता की सही जांच हो रही है?
गिरे हुए पेड़ों की नीलामी का उद्देश्य जंगलों की सफाई और राजस्व बढ़ाना था, लेकिन क्या यह प्रक्रिया ठेकेदार और अधिकारियों के निजी फायदे के लिए इस्तेमाल हो रही है?
यह मामला उत्तराखंड वन विभाग में पहले भी सामने आए घोटालों की कड़ी लग रहा है। पहले भी वन विकास निगम के विभिन्न डिपो (जैसे लालकुआं आदि) में लकड़ी नीलामी और बिक्री में अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं, जहां कर्मचारियों और ठेकेदारों की सांठगांठ से लाखों-करोड़ों का घपला सामने आया था।
क्या कहते हैं सूत्र?
स्थानीय सूत्रों और जागरूक नागरिकों का आरोप है कि जंगलों के अंदर से लकड़ी काटने के बाद उसे डिपो तक ले जाने की बजाय रास्ते में ही बेच दिया जा रहा है। इससे जंगलों का दोहन तो हो रहा है, साथ ही सरकारी खजाने को भी चोट पहुंच रही है।
वन विभाग के अधिकारी इस पूरे मामले पर अभी तक कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल वन संपदा की लूट है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाने वाला गंभीर मामला है।
अब क्या होना चाहिए?
वन विभाग और पुलिस को तुरंत उच्च स्तरीय जांच शुरू करनी चाहिए।
नीलामी प्रक्रिया, ठेकेदार द्वारा काटी गई लकड़ी की मात्रा, डिपो में पहुंची मात्रा और अंतर की पूरी जांच हो।
दोषी ठेकेदार और संलिप्त अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में ऐसी लूट न हो सके।
पछवादुन और रुद्रपुर जैसे संवेदनशील जंगली क्षेत्रों में वन संपदा की सुरक्षा बेहद जरूरी है। अगर अधिकारी समय रहते कार्रवाई नहीं करते, तो यह प्रदेश की हरियाली और आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।


